

बिहार से झारखण्ड को अलग हुए लगभग ८ साल होने को है.लेकिन जिस उद्दयेश और मकसद से झारखण्ड बना वो मकसद कामयाब होता नज़र नही आता. झारखण्ड के साथ -साथ ,छ्तीश्गढ़ और उत्तरांचल भी अलग हुए थे .लेकिन किसी राज्य मे स्थिरता कायम नही हो पा रही है। राज्य बटवारे का फार्मूला बिल्कुल फ़ेल हो चुका है। बिहार मे जब राज्य बटवारे की बात चल रही थी ,उस समय बिहार मे लालू की सरकार थी .जो बटवारे के खिलाफ मानी जाती थी.ख़ुद लालू भी इसे बीजेपी की साजिश करार देते थे.आप को याद होगा एक आम सभा मे लालू ने गाँधी मैदान मे भीर के सामने ये एलान किया था , की मेरी लाश पर बिहार का बटवारा होगा.इस घोषणा के कुछ ही दिनों बाद बिहार का बटवारा होगया. ये तो सभी जानते है ,की नेताओं की फितरत रही है अपने बयान से पलट जाना ,लेकिन पब्लिक की स्मरण शक्ति इतनी कमज़ोर नही होती है, की संवेदनशील बातों को भूल जाय .लेकिन उस समय का गणित शायद लालू को पता चल गया .क्योंकि एंटी लालू लहर दक्षिण बिहार से उत्तर के मैदानी इलाके की तरफ़ बढ़ता जा रहा था.इस का उदाहरण नीतिश कुमार की ७ दिनों की सरकार थी.दरसल मे बटवारे से पूर्व बिहार का आर्थिक और सामाजिक ढांचा परस्पर उत्तर और दक्षिण बिहार मे बटा था.उत्तर बिहार की अपेक्षा दक्षिण बिहार आर्थिक और सामाजिक रूप से ज्यादा बिकसित था। उत्तर मे सोना उगलने वाली ज़मीन थी तो,दक्षिण मे प्रचुर मात्रा मे खनिज पदार्थ .पूरे देश मे बिहार ही अकेला ऐसा राज्य था जिसमे हर प्रकार के साधन उपलब्ध थे.भूगोलिक रूप ऐसा किसी राज्य मे नही था.जैसे की उत्तर मे खेती लायक जमीन और दक्षिण मे खनिज और कल कारखाने .दक्षिण बिहार मूल रूप से आदिवासियों का इलाका था.वहाँ भी समस्याए थी, लेकिन इसका हल बटवारा नही था.बटवारा होने से दोनों राज्यों को क्षति हुई है .एक को खेती लायक जमीन से हाथ धोना परा, और एक को उद्योग और खनिजों से.आदिवासियों के लिए अलग प्रदेश का गठन किया गया था. लेकिन आज और अभी भी वो हासिये पर है .झारखण्ड मे स्वार्थी नेताओं की वज़ह से सरकार का कोई वजूद नही रह गया है.मैं पिछले दो साल जमशेदपुर मे रहा ,वहाँ के लोगो से बातचीत के क्रम मे मैंने इस मुद्दे पे लोगो का नजरिया लिया ,उनके चेहरे पे निराशा के बादल नज़र आए.यहाँ तक तो उनलोगों ने कहा की इससे अच्छे तो अविभाजित बिहार मे थे ,कम से कम टिकाऊ सरकार तो थी .नेता इस तरह भ्रष्टाचार मे तो ना डूबे थे .आज मधु कोरा की सरकार हमेशा अपनी सरकार बचाने के चक्कर मे रहती है.वो पब्लिक को क्या देखेगी। सारे विकाश कार्य बंद परे है.राज्य के २४ जिले मे २२ जिले नक्सल प्रभाबित है.जो बिहार से उन्हें उपहार सरीखे हासिल हुए है.वही हाल बिहार का भी है,बटवारे के बाद सारे उद्योग धंधे झारखण्ड चले गए ,बिहार उद्योग बिहीन हो गया.इस बटवारे से जनता को कुछ हासिल नही हुआ, सिबाए दुखो और तकलीफों के .नेताओं की चांदी जरूर हो गयी .